Thursday, 13 August 2015

मूँगफली

मूँगफली है सेहत का खजाना


भारत में इसे 'गरीबों का बादाम' के नाम से भी जाना जाता है।एक बादाम जाड़े में जितना फायदा देता है मूंगफली भी सेहत के लिहाज से उतना फायदा देती है। मूंगफली में सभी पौष्टिक तत्व पाए जाते हैं।
मूंगफलीमें मौजूद पोषक तत्वों की भरमार होती है । करीब 100 ग्राम मूंगफली में आपको 567 कैलोरी, 49 ग्राम फैट्स जिसमें सात ग्राम सैचुरेटेड 40 ग्राम अनसैचुरेटेड फैट्स, जीरो कोलेस्ट्रॉल, सोडियम 18 मिलीग्राम, पोटैशियम 18 मिलीग्राम, कार्बोहाइड्रेट, फोलेट, विटामिन्स, प्रोटीन, फाइबर आदि अच्छी मात्रा में हैं।
यह वनस्पतिक प्रोटीन का एक सस्ता स्रोत भी हैं। एक अंडे की कीमत में जितनी मूंगफली आती है, उसमें इतना प्रोटीन होता है जितना दूध और अंडे में भी नहीं होता है। 250 ग्राम मूँगफली के मक्खन से 300 ग्राम पनीर, 2 लीटर दूध या 15 अंडों के बराबर ऊर्जा की प्राप्ति आसानी से की जा सकती है।
फर्टिलिटी बढ़ती है। मूंगफली में फोलेट अच्छी मात्रा में है। कई शोधों में माना जा चुका है कि जो महिलाओं 700 माइक्रोग्राम फोलिक एसिड वाली डाइट का सेवन करती हैं उनके गर्भवती होने व गर्भस्थ शिशुओं की सेहत में 70 प्रतिशत तक का फायदा होता है।
ब्लड शुगर पर नियंत्रण एक चौथाई कप मूंगफली के सेवन से शरीर को 35 प्रतिशत तक मैगनीज मिलता है जो फैट्स पर नियंत्रण और मेटाबॉलिज्म ठीक रखता है। इसका नियमित सेवन खून में शुगर की मात्रा संतुलित रखता है।
मूंगफली के खाने से दूध, बादाम और घी की पूर्ति हो जाती है।इसे खाने से कोलेस्ट्रॉल कंट्रोल में रहता है। कोलेस्ट्रॉल की मात्रा में 5.1 फीसदी की कमी आती है। इसके अलावा कम घनत्व वाले लिपोप्रोटीन कोलेस्ट्राल (एलडीएलसी) की मात्रा भी 7.4 फीसदी घटती है। एक सर्वे के मुताबिक जिन लोगों के रक्त में ट्राइग्लाइसेराइड का लेवल अधिक होता है, वे अगर मूंगफली खाएं, तो उनके ब्लड के लिपिड लेवल में ट्राइग्लाइसेराइड का लेवल 10 फीसदी कम हो जाता है मूँगफली शरीर में गर्मी पैदा करती है, इसलिए सर्दी के मौसम में ज्यादा लाभदायक है। यह खांसी में उपयोगी है व मेदे और फेफड़े को बल देती है।
इसे भोजन के साथ सब्जी, खीर, खिचड़ी आदि में डालकर नित्य खाना चाहिए। मूंगफली में तेल का अंश होने से यह वायु की बीमारियों को भी नष्ट करती है।
वजन घटाने में फायदेमंद-
शोधों में मानी जा चुका है कि जो लोग रोज मूंगफली का सेवन करते हैं उन्हें वजन घटाने में दूसरों की अपेक्षा दोगुनी आसानी होती है।
मूँगफली को जाड़े के अलावा हर मौसम मे खा सकते है ये रसोई मे निम्न प्रकार से प्रयोग मे लाई जाती है
1. मूँगफली को पुलाव, पोहे, ओर खिचड़ी मे भून कर प्रयोग कर सकते है।
2.मूँगफली की चटनी - सामग्री :
मूंगफली के दाने भूने और छिले हुए - 1 कटोरी

, 2-4 हरी मिर्च, 1 टे.स्पून तेल, 1/4 टी स्पून राई पाउडर, नमक स्वादानुसार।
विधि -मूंगफली के दाने मिक्सर जार में डाल दीजिये, आधा कप पानी डाल दीजिये इसमें नमक और हरी मिर्च डाल कर बारीक पीस लीजिये. चटनी को प्याले में निकालिये अगर यह आपको बहुत अधिक गाढ़ी लगे तो थोड़ा पानी और मिला दीजिये, अब इसमें नीबू का रस निकाल कर मिला दीजिये.
गैस पर छोटी कढ़ाई गरम कीजिये और तेल डालिये, गरम तेल में राई डालिये. राई कड़कड़ाहट के साथ भुन जायेगी. गैस बन्द कर दीजिये, 1-2 पिंच लाल मिर्च पाउडर डालिये और तड़के को चटनी में डाल दीजिये. चम्मच से एक दो बार चला दीजिये. मूँगफली की चटनी तैयार है.
3. मूंगफली की चिक्की - सामग्री
मूंगफली के दाने- 500 ग्राम
गुड़ या चीनी- 500 ग्राम
घी- 2 छोटी चम्मच
विधि -मूंगफली के दानों को घर में भूनना चाहती है, तो मूंगफली के दानों में एक छोटी चम्मच पानी डालकर मिलाये और 2-3 मिनिट बाद माइक्रोवेव में 5 मिनिट के लिये भून लें. देख लें कि मूगफली के दाने भून गये हैं, अगर नहीं तो और 2 मिनिट के लिये माइक्रोवेव करें. ठंडा होने पर छिलका उतार लें.अगर माक्रोवेव नहीं करना चाहते तो एक कढाई ले और गर्म करे और उसमे मूंगफली दाने को डाले औरमूंगफली के दाने को भुन ले , और उनका छिलका निकाल लीजिये, कढ़ाई में दो छोटी चम्मच घी डाल कर गैस पर रखें और कर गरम करें.
गुड़ तोड़ कर कढ़ाई में डालें, गुड़ को चलाते जायं. (मीडियम गैस पर पकायें) गुड़ पिघलने लगता है
आप उसे लगातार चलाते हुये पकायें, जब सारा गुड़ पिघल जाने के बाद चाशनी को 4-5 मिनिट तक और पकायें, चाशनी तैयार है.चाशनी में मूंगफली के दाने डालकर अच्छी तरह मिलाइये,
2-3 मिनिट तेज चलाते हुये पकाइये. एक प्लेट में घी लगाकर चिकना कीजिये.
कढ़ाई में बनी हुई चिक्की तुरन्त प्लेट में बेलन की सहायता से फैलाइये. चाकू की सहायता से अपने मन पसन्द आकार में काट लीजिये. और ठंडा होने पर टुकड़ों को अलग अलग कर लीजिये.
मूंगफली की चिक्की तैयार है.

66 सालों में सिर्फ सौ राजस्थानी फिल्में


कछुआ चाल वाली कहावत शायद इसी के लिए बनाई गई थी। क्षेत्रीय सिनेमा की दुनिया में राजस्थानी फिल्में आज बहुत ही सुस्त चाल में चल रही हैं और यह चाल भी ऐसी की 100 का आंकड़ा छूने में 66 वर्ष लग गये। इस बढ़ती उम्र के बावजूद यह नहीं कहा जा सकता कि हमारा सिनेमा अब परिपक्व हो गया है। साल-दर-साल बचकानी फिल्में और हर नई फिल्म के साथ दर्शकों की दम तोड़ती उम्मीदें। पहली राजस्थानी फिल्म ‘नजराना’ 1942 में आई थी और अब 2008 में ‘ओढ़ ली चुनरिया रे’ सौवीं फिल्म के रूप में सैंसर सर्टिफिकेट हासिल किया है। हिन्दी, तमिल या तेलुगु में इनसे दुगुनी फिल्में तो एक साल में बन जाती है। इनमें कई फिल्में तो ऐसी होती है जो दुनिया भर में कामयाबी का परचम लहराती है। पर राजस्थानी में अगर जगमोहन मूंधड़ा की फिल्म ‘बवंडर’ को अलग कर दें तो 66 साल में अंतर्राष्ट्रीय स्तर तो दूर, राष्ट्रीय स्तर की भी कोई फिल्म नहीं बन पाई है। भंवरी देवी प्रकरण 2001 में बनी फिल्म ‘बवंडर’ ने राजस्थानी सिनेमा को न सिर्फ पहली बार विदेशों तक पहुँचाया, बल्कि कई अंतर्राष्ट्रीय फिल्म फेस्टिबलों में चर्चा और अवार्ड हासिल कर राजस्थान का परचम फहराया है। अभी के इस दौर में भोजपुरी फिल्में देश-विदेशों में जो धुंआधार प्रदर्शन कर रही हैं, वो जगजाहिर है। महत्वपूर्ण बात तो यह है कि भोजपुरी सिनेमा ने यह बुलंदी अपने बलबूते हासिल की है, किसी सरकारी सहायता और टैक्स-फ्री की सुविधा के बगैर रविकिशन और मनोज तिवारी जैसे नये अभिनेताओं के जरिये, भोजपुरी भाषा बोलनेवाले दर्शकों के व्यापक समर्थन के दम पर।
भोजपुरी भाषा बोलने वालों की तरह राजस्थानी बोलने वाले इस देश और दुनिया भर में फैले हुए हैं। वे जहां भी रह रहे हैं, वहां वर्षों से अपनी जमीन, जड़ और जुबान से जुड़े हुए हैं। अपने घरों को संस्कारों से सजाकर रखते हैं तथा अपनी कला-संस्कृति से प्यार करते हैं। राजस्थानी में साफ-सुथरा, सुरुचिपूर्ण मनोरंजन देखने-सुनने को मिले, तो उसे भी उतने ही चाव से अपना सकते हैं। पर हिन्दी और दूसरे प्रादेशिक सिनेमा से राजस्थानी सिनेमा इतना पीछे और पिछड़ा है कि लगता है यह दौड़ से ही बाहर हो गया है। पर इच्छाशक्ति, चाह, लगाव और साहस हो तो दर्शकों का ‘सपोर्ट पाकर, टीवी म्यूजिकल शो के प्रतियोगी की तरह फिर इस रेस में शामिल हो सकता है। राजस्थानी गीत-संगीत में रचे-बसे ‘बीणा’ के अलबमों को देश और दुनिया में जितनी लोकप्रियता मिली है, उससे ही यह बात साबित हो जाती है। राजस्थानी सिनेमा से जुड़े हुए फिल्मकारों को इस बात पर ईमानदार प्रयास करने की जरुरत है।
1942 से 2008 तक बनी हुई क्रमवार राजस्थानी फिल्में
1. नज़राना 2. बाबासा री लाडली 3. नानीबाई कौ मायरौ 4. बाबा रामदेव पीर 5. बाबा रामदेव 6. धणी-लुगाई 7. ढोला-मरवण 8. गणगौर 9.गोपीचंद-भरथरी 10. गोगाजी पीर 11. लाज राखो राणी सती 12. सुपातर बीनणी 13. वीर तेजाजी 14. गणगौर 15. सती सुहागण 16. म्हारी प्यारी चनणा 17. सुहागण रौ सिणगार 18. पिया मिलण री आस 19. चोखौ लागै सासरियौ 20. राम-चनणा 21. सावण री तीज 22. देवराणी-जेठाणी 23. डूंगर रौ भेद 24. नणद-भौजाई 25. थारी म्हारी 26. जय बाबा रामदेव 27. धरम भाई 28. बिकाऊ टोरड़ौ/अच्छायौ जायौ गीगलौ 29. करमा बाई 30. नानीबाई को मायरौ 31. बाई चाली सासरिये 32. ढोला-मारु 33. रामायण 34. जोग-संजोग/बाई रा भाग 35. बाईसा रा जतन करो 36. सतवादी राजा हरिश्चंन्द्र 37. घर में राज लुगायां कौ 38. रमकूड़ी-झमकूड़ी 39. बेटी राजस्थान री 40. चांदा थारै चांदणे 41. मां म्हनै क्यूं परणाई 42. बीनणी बोट देणनै 43. माटी री आण 44. सुहाग री आस 45. दादोसा री लाडली 46. वारी जाऊं बालाजी 47. भोमली 48. भाई दूज 49. बंधन वचनां रौ 50. मां राखो लाज म्हारी 51. जय करणी माता 52. चूनड़ी 53. लिछमी आई आंगणे 54. बीनणी 55. रामगढ़ की रामली 56. खून रौ टीकौ 57. जाटणी 58. डिग्गीपुरी का राजा 59. बीरा बेगौ आईजै रे 60. गौरी 61. बालम थारी चूनड़ी 62. बेटी हुई पराई रे 63. बाबा रामदेव 64. दूध रौ करज 65. बीनणी होवै तौ इसी 66. बापूजी नै चायै बीनणी 67. माता राणी भटियाणी 68.राधू की लिछमी 69. छम्मक छल्लो 70. लाछा गूजरी 71. जियो म्हारा लाल 72. देव 73. सरूप बाईसा 74. जय नाकोड़ा भैरव 75. सुहाग री मेहंदी 76. छैल छबीली छोरी 77. कोयलड़ी 78. जय सालासर हनुमान 79. गोरी रौ पल्लौ लटकै 80. म्हारी मां संतोषी 81. बवंडर 82. मां राजस्थान री 83. जय जीण माता 84. मेंहदी रच्या हाथ 85. चोखी आई बीनणी 86. ओ जी रे दीवाना 87. मां-बाप नै भूलजो मती 88. खम्मा-खम्मा वीर तेजा 89. लाडकी 90. जय श्री आई माता 91. लाडलौ 92. पराई बेटी 93. प्रीत न जाणै रीत 94. मां थारी ओळू घणी आवै 95. जय मां जोगणिया 96. जय जगन्नाथ 97. कन्हैयो 98. म्हारा श्याम धणी दातार 99. मां भटियाणीसा रौ रातीजोगौ 100. ओढ़ ली चुनरिया

राजस्थानी लोकगीत


1. एक बार आओजी जवाईजी पावणा
एक बार आओजी जवाईजी पावणा
थाने सासूजी बुलावे घर आज जवाई लाड्कना
सासूजी ने मालुम होवे म्हारे भाई आज होयो
म्हारे घरे से मौक्ळो काम सासूजी मने माफ करो...

एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने सुसराजी बुलावे घर आज जवाई लाड्कना
सुसराजी ने मालूम होवे बाप म्हारो सेहर गयो
म्हारे घर से लारलो काम
सुसराजी मने माफ करो

एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने साळीजी बुलावे घर आज जवाई लाड्कना
साळीजी ने मालुम होवे साढुजी ने भेजू हूँ
म्हारा साढुजी नाचेला सारी रात
साळीजी मने माफ करो

एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने बुवाजी बुलावे घर आज जवाई लाड्कना
बुवाजी ने मालुम होवे म्हारे भी बुवाजी आया
बुवासासुजी ने जोडू लंबा लंबा हाथ बुवाजी मने माफ करो

एक बार आओजी जवाईजी पावणा......
थाने लाडीजी बुलावे घर आज जवाई लाड्कना
लाडीजी बुलावे तो लाडोजी भी आवे है
मैं तो जाऊंला सासरिये आज साथिङा मने माफ करो

एक बार आओजी जवाईजी पावणा...........
थाने सासूजी बुलावे घर आज जवाई लाड्कना....
थाने सुसराजी बुलावे घर आज जवाई लाड्कना...
थाने साळीजी बुलावे घर आज जवाई लाड्कना....
थाने बुवाजी बुलावे घर आज जवाई लाड्कना...
थाने लाडीजी बुलावे घर आज जवाई लाड्कना...

2. उड़ उड़ रे उड़ उड़ रे
उड़ उड़ रे उड़ उड़ रे
उड़ उड़ रे म्हारा, काळा रे कागला
कद म्हारा पीव्जी घर आवे
कद म्हारा पीव्जी घर आवे , आवे र आवे
कद म्हारा पिव्जी घर आवे

उड़ उड़ रे म्हारा काळा र कागला
कद माहरा पीव्जी घर आवे

खीर खांड रा जीमण जीमाऊँ
सोना री चैंच मंढाऊ कागा
जद म्हारा पिव्जी घर आवे, आवे रे आवे
उड़ उड़ रे उड़ उड़ रे
म्हारा काळा र कागला
कद माहरा पीव्जी घर आवे

पगला में थारे बांधू रे घुघरा
गला में हार कराऊँ कागा
जद महारा पिव्जी घर आवे

उड़ उड़ रे
महारा काळा रे कागला
कद महारा पिव्जी घर आवे
उड़ उड़ र महारा काला र कागला
कद महरा पिव्जी घर आवे

जो तू उड़ने सुगन बतावे
जनम जनम गुण गाऊँ कागा
जद मारा पिव्जी घर आवे , आवे र आवे
जद म्हारा पिव्जी घर आवे

उड़ उड़ रे उड़ उड़ रे
उड़ उड़ रे उड़ उड़ रे महारा काळा रे कागला
कद म्हारा पिव्जी घर आवे
उड़ उड़ रे उड़ उड़ रे

उड़ उड़ रे उड़ उड़ रे म्हारा काळा रे कगला
जद म्हारा पिव्जी घर आवे

रणसी गांव री सच्ची राजस्थानी कहानी


एक बार जब ठाकुर जयसिंह घोड़े पर सवार होकर जोधपुर से रणसी गांव (रणसी गांव यह जोधपुर से लगभग 90 किलोमीटर की दूरी पर स्थित एक ऐतिहासिक गांव है) की ओर जा रहे थे तब रास्ते में ठाकुर साहब का घोड़ा उनके साथ-साथ चलने वाले सेवकों से पीछे छूट गया और इतने में रात हो गई।

राजा का घोड़ा काफी थक चुका था और उसे बहुत प्यास लगी थी। रास्ते में एक तालाब को देखकर ठाकुर जयसिंह अपने घोड़े को पानी पिलाने के लिए ले गए। आधी रात का समय था घोड़ा जैसे ही आगे बढ़ा राजा को एक आकृति दिखाई दी जिसने धीरे-धीरे इंसानी शरीर धारण कर लिया। राजा उसे देखकर डर गया, उस प्रेत ने राजा को कहा कि मुझे प्यास लगी है लेकिन श्राप के कारण मैं इस कुएं का पानी नहीं पी सकता। राजा ने उस प्रेत को पानी पिलाया और राजा की दयालुता देखकर प्रेत ने उसे कहा कि वह जो भी मांगेगा वह उसे पूरी कर देगा।
राजा ने प्रेत को कहा कि वह उसके महल में एक बावड़ी का निर्माण करे और उसके राज्य को सुंदर बना दे. भूत ने राजा के आदेश को स्वीकारते हुए कहा कि वो ये कार्य प्रत्यक्ष रूप से नहीं करेगा, लेकिन दिनभर में जितना भी काम होगा वह रात के समय 100 गुना और बढ़ जाएगा. उस प्रेत ने राजा को यह राज किसी को ना बताने के लिए कहा।
इस घटना के दो दिन बाद ही महल और बावड़ी की इमारतें बनने लगीं. रात में पत्थर ठोंकने की रहस्यमय आवाजें आने लगीं, दिन-प्रतिदिन निर्माण काम तेज गति से बढ़ने लग। लेकिन रानी के जिद करने पर राजा ने यह राज रानी को बता दिया कि आखिर निर्माण इतनी जल्दी कैसे पूरा होता जा रहा है. राजा ने जैसे ही यह राज रानी को बताया सारा काम वहीं रुक गया। बावड़ी भी ज्यों की त्यों ही रह गई. इस घटना के बाद किसी ने भी उस बावड़ी को बनाने की कोशिश नहीं की।

राजस्थानी कहावतां


खाट पड़े ले लीजिये, पीछे देवै न खील।
आं तीन्यां रा एक गुण, बेस्या बैद उकील।

बैस्या, बैद्यराज अर्थात डाक्टर, वकील इन तीनों की एक ही समानता है कि जब आदमी को जरूरत होती है तभी उनको याद करता है। काम हो जाने के बाद वह पलटकर भी इनको नहीं देखने आता।
कहावत का तात्पर्य है -
जब आदमी को काम पड़े उसी वक्त उससे अपना लेन-देन कर लेना चाहिए। -आपणी भासा

गरबै मतना गूजरी, देख मटूकी छाछ।
नव सै हाथी झूंमता, राजा नळ रै द्वार।।

राजा नळ के दरवाजे पर 900 हाथियों का झूंड खड़ा रहता था वह भी समाप्त हो गया। पर तुम अपनी एक हांडी छाछ पर इतराता है।
कहावत का तात्पर्य है -
अपनी संपत्ति पर इतना मत घमंड करो। एक दिन सब समाप्त हो जाता है। -आपणी भासा

ग्यानी सूं ग्यानी मिलै, करै ग्यान री बात।
मूरख सूं मूरख मिलै, कै जूता कै लात।।

इस कहावत का भावार्थ बहुत सरल है। संगत जैसी वैसी करनी। -आपणी भासा

चोदू जात मजूर री, मत करजे करतार।
दांतण करै नै हर भजै, करै उंवार-उंवार।।

मजदूरी करने वाला आदमी न तो कभी ठीक से भजन-किर्तन करता है ना ही ठीक से नहाता-खाता है बस जब उससे बात करो तो बोलता है कि बहुत समय हो गया।
कहावत का तात्पर्य है -
जो अस्त-व्यस्त रहता है उसी के पास समय नहीं रहता। -आपणी भासा

जायो नांव जलम को रैणौ किस विध होय?

जन्म लेने वाले बच्चे को 'जायो' कहा जाता है तो वह अमर कैसे हुआ?
कहावत का तात्पर्य है - एक दिन सबको जाना तय है। जन्म लेने के साथ ही मौत तय निष्चित हो जाती है। -आपणी भासा

ज्यूं-ज्यूं भीजै कामळी, त्यूं-त्यूं भारी होय।

कपास, रुई या कम्बल जैसे-जैसे पानी में भींगती है वह किसी काम के लायक नहीं रह जाती।
कहावत का तात्पर्य है -
जैसे-जैसे आदमी में किसी भी बात का घमंड बढ़ने लगता है वह समाज से कट जाता है।
इस कहावत को कुछ लोग यह अर्थ भी लगाते हैं- जैसे-जैसे धन आने लगता है उस आदमी की कर्द समाज में होने लगती है। -आपणी भासा

 ऊपर थाली नीचै थाली मांय परोसी डेढ सुहाली।
बांटण आली तेरा जणीं, हांते थोड़ी हाले घणीं।।

दो थाली के बीच में खाने की बहुत सारी सुहाली (मैदे या आंटा से बना हुआ खाने का सामान जो छोटी रोटी नूमा होती है जिसे घी या तेल में तल कर बनाया जाता है) जिसे 13 औरतें खाने वाले को बांटती (भोजन परोसना) है परन्तु खाने वाला ललचाई आंखों से उनको देखते ही रह जाते हैं तब उनमें से एक जन कहता है कि 13 जनी सुहाली लेकर केवल हिल रही है पर देती नहीं है।

अर्थात केवल दिखावा है। आडम्बर अधिक है।

आंधे री गफ्फी बोळै रो बटको।
राम छुटावै तो छुटे, नहीं माथों ई पटको।।

आंघे और बहरे आदमी से पिंड छुड़ाना कठिन कार्य है।


आगम चौमासै लूंकड़ी, जै नहीं खोदे गेह।
तो निहचै ही जांणज्यों, नहीं बरसैलो मेह।।

वर्षाकाल के पूर्व लोमड़ी यदि अपनी ‘घुरी’ नहीं खोदे तो निश्चय जानिये कि इस बार वर्षा नहीं होने वाली है।


इस्या ही थे अर इस्या ही थारा सग्गा।
वां के सर टोपी नै, थाकै झग्गा।

संबंधी आपस में एक-दूसरे की इज्जत नहीं उझालते। इसी बात को गांव वाले व्यंग्य करते हुए कहतें हैं कि यदि आप उनकी उतारोगे तो वह भी अपकी इज्जत उतार देगें दोनों के पूरे वस्त्र नहीं है - ‘‘ एक के सर पर टोपी नहीं तो दूसरे ने अंगा नहीं पहना हुआ है।’’


आज म्हारी मंगणी, काल म्हारो ब्याव।
टूट गयी अंगड़ी, रह गया ब्याव।।

जल्दीबाजी में अति उत्साहित हो कर जो कार्य किया जाता है उसमें कोई न कोई बाधा आनी ही है।


कुचां बिना री कामणी, मूंछां बिना जवान।
ऐ तीनूं फीका लगै, बिना सुपारी पान।।

स्त्री के स्तनों का उभार न हो, मर्दों को मूंछें और पान में सूपारी न होने से उसकी सौंदर्यता नहीं रहती।


दियो-लियो आडो आवै।

दिया-लिया या अपना व्यवहार ही समय पर काम आता है।


धण जाय जिण रो ईमान जाए।

जिसका धन चला जाता है उसका ईमान भी चला जाता है।


धन-धन माता राबड़ी जाड़ हालै नै जाबड़ी।
धन आने के बाद आदमी का शरीर हिलना बन्द कर देता है। इसी बात को व्यंग्य करते हुए लिखा गया है कि राबड़ी खाते वक्त दांत और जबड़ा को को कष्ट नहीं करना पड़ता है।


ठाकर गया’र ठग रह्या, रह्या मुलक रा चोर।
बै ठुकराण्यां मर गई, नहीं जणती ठाकर ओर।।

ठाकुर चले गये ठग रह गये, अब देश में चोरों का वास है।
अब वैसी जननी मर चुकी, जो राजपुतों को जन्म देती थी।।
कहावत का तात्पर्य समाज की वर्तमान व्यवस्था पर व्यंग्य करना है। जिसमें देश में व्याप्त भ्रष्टाचार की तरफ इशारा करते हुए कहा जा सकता है कि अब देश के लिए कोई कार्य नहीं करता। सब के सब ठग हो चुके हैं जो देश को चारों तरफ को लूटने में लगे हैं।


टुकरा दे-दे बछड़ा पाळ्या,
सींग हुया जद मारण आया।

मां-बाप बच्चों को बहुत दुलार से पालते हैं परन्तु जब वह बच्चा बड़ा हो जाता है तो मां-बाप को सबसे पहले उसी बच्चे की लात खानी पड़ती है।


जावै तो बरजुं नहीं, रैवै तो आ ठोड़।
हंसां नै सरवर घणा, सरवर हंस करोड़।।

जाने वाले को रोकना नहीं चाहिए, वैसे ही ठहरने वाले को जगह देनी चाहिए। जिस प्रकार हंस को बहुत से सरोवर मिलते हैं वैसे ही सरोवर को भी करोड़ों हंस मिल जाते हैं। अर्थात किसी को भी घमण्ड नहीं करना चाहिए।


जात मनायां पगै पड़ै, कुजात मनायां सिर चढ़ै।

समझदार व्यक्ति को समझाने से वह अपनी गलती को स्वीकार कर लेता है जबकि मूर्ख व्यक्ति लड़ पड़ता है।


राजस्थानी शब्दों का हिन्दी अर्थ

आंधे री गफ्फी - अंधे से हाथ, आली - क्रिया स्त्री., आडो - समय पर, इस्या - ऐसे ही, कामणी - स्त्री, कुचां - स्तन, कुजात - मूर्ख या ना समझ, गेह - घर, घणीं, घणा - अधिक, बहुत, जाड़ - दांत, जाबड़ी - जबड़ा, जांणज्यों - जानिये, जणीं - स्त्री, जिण रो - जिसका, जात - समझदार, परोसी - बांटना, बोळै रो बटको - बहरे को समझाना, बरजुं - रोकना मेह - वर्षा, मांय - बीच में, मुलक - देश, डेढ - बहुत सारी, ठोड़ - जगह, तेरा - 13, थे - आप, थारा - आपका, थाकै - आपके, निहचै - निश्चय, लूंकड़ी - लोमड़ी, वां के - उनके, सुहाली - मैदे या आंटा से बना हुआ खाने का सामान जो छोटी रोटी नूमा होती है जिसे घी या तेल में तल कर बनाया जाता है। हांते -देना, हाले - हिलना।

रक्षाबंधन


रक्षाबन्धन एक हिन्दू त्यौहार है जो प्रतिवर्ष श्रावण मास
की पूर्णिमा के दिन मनाया जाता है। श्रावण (सावन) में
मनाये जाने के कारण इसे श्रावणी (सावनी)
या सलूनो भी कहते हैं।
[1] ग्रेगोरियन कैलेण्डर के अनुसार 2012
में रक्षाबन्धन गुरुवार, 2 अगस्त को मनाया गया।
[2]
रक्षाबन्धन में राखी या रक्षासूत्र का सबसे अधिक महत्व है।
राखी कच्चे सूत जैसे सस्ती वस्तु से लेकर रंगीन कलावे,
रेशमी धागे, तथा सोने या चाँदी जैसी मँहगी वस्तु तक
की हो सकती है। राखी सामान्यतः बहनें भाई
को ही बाँधती हैं परन्तु ब्राह्मणों, गुरुओं और परिवार में
छोटी लड़कियों द्वारा सम्मानित सम्बन्धियों (जैसे
पुत्री द्वारा पिता को) भी बाँधी जाती है।
कभी कभी सार्वजनिक रूप से किसी नेता या प्रतिष्ठित
व्यक्ति को भी राखी बाँधी जाती है।
अब तो प्रकृति संरक्षण हेतु वृक्षों को राखी बाँधने
की परम्परा भी प्रारम्भ हो गयी है।
[3] हिन्दुस्तान में
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के पुरुष सदस्य परस्पर भाईचारे के लिये
एक दूसरे को भगवा रंग की राखी बाँधते हैं।
[4] हिन्दू धर्म के
सभी धार्मिक अनुष्ठानों में रक्षासूत्र बाँधते समय
कर्मकाण्डी पण्डित या आचार्य संस्कृत में एक श्लोक
का उच्चारण करते हैं, जिसमें रक्षाबन्धन का सम्बन्ध राजा
बलि से स्पष्ट रूप से दृष्टिगोचर होता है। यह श्लोक रक्षाबन्धन
का अभीष्ट मन्त्र है।
[क] इस श्लोक का हिन्दी भावार्थ है-
"जिस रक्षासूत्र से महान शक्तिशाली दानवेन्द्र
राजा बलि को बाँधा गया था, उसी सूत्र से मैं तुझे बाँधता हूँ,
तू अपने संकल्प से कभी भी विचलित न हो।"
अनुष्ठान

मुख्य लेख : रक्षासूत्र

प्रातः स्नानादि से निवृत्त होकर लड़कियाँ और महिलाएँ
पूजा की थाली सजाती हैं। थाली में राखी के साथ रोली
या हल्दी , चावल , दीपक , मिठाई और कुछ पैसे भी होते हैं। लड़के
और पुरुष तैयार होकर टीका करवाने के लिये
पूजा या किसी उपयुक्त स्थान पर बैठते हैं। पहले अभीष्ट देवता
की पूजा की जाती है, इसके बाद रोली या हल्दी से भाई
का टीका करके चावल को टीके पर लगाया जाता है और
सिर पर छिड़का जाता है, उसकी आरती उतारी जाती है,
दाहिनी कलाई पर राखी बाँधी जाती है और पैसों से
न्यौछावर करके उन्हें गरीबों में बाँट दिया जाता है। भारत के
अनेक प्रान्तों में भाई के कान के ऊपर भोजली या भुजरियाँ
लगाने की प्रथा भी है। भाई बहन को उपहार या धन देता है।
इस प्रकार रक्षाबन्धन के अनुष्ठान को पूरा करने के बाद
ही भोजन किया जाता है। प्रत्येक पर्व की तरह उपहारों और
खाने-पीने के विशेष पकवानों का महत्व रक्षाबन्धन में
भी होता है। आमतौर पर दोपहर का भोजन महत्वपूर्ण होता है
और रक्षाबन्धन का अनुष्ठान पूरा होने तक बहनों द्वारा व्रत
रखने की भी परम्परा है। पुरोहित तथा आचार्य सुबह सुबह
यजमानों के घर पहुँचकर उन्हें राखी बाँधते हैं और बदले में धन
वस्त्र और भोजन आदि प्राप्त करते हैं। यह पर्व भारतीय समाज
में इतनी व्यापकता और गहराई से समाया हुआ है
कि इसका सामाजिक महत्व तो है ही, धर्म , पुराण, इतिहास ,
साहित्य और फ़िल्में भी इससे अछूते नहीं हैं।

आपणो बचपन


जाने कब हम इतने बड़े हो गए

कभी पहली बार स्कूल जाने मे डर लगता था
आज मिलते हे दोस्त बन जाते है
कभी मां-बाप की हर बात सच्ची लगती थी
आज उन्ही को हर पल झूटलाते है.......

परीयो की कहानी की जगह आजकल रात को
फोन पर दोस्त की बात सुनना ज्यादा अच्छा लगता है..........

पहले 1st आने के लिए पूरे साल पढते थे
आज पास होने को तरसते है
कार्टून की जगह अब रीयलटी शो अच्छे लगते है........

कभी छोटी सी चोट लगने पर इतना रोते थे
आज दिल टूट जाता है फिर भी संभल जाते है
पहले दोस्त बस साथ खेलने तक याद रहते थे
आज वो ही दोस्त जान से ज्यादा प्यारे लगते है.......

एक दिन था जब पल मे लडना पल मे मनना था रोज का काम
आज जो एक बार जुदा हुए तो फिर घेहरे रिश्ते तक खो जाते है.......

सच मे जिन्दगी ने बहुत कुछ सिखा दिया
जाने कब हमे इतना बड़ा बना दिया..........